काश
काश से सवाल हल हुआ नही करते
यह जिन्दगी इसके सहारे जी नही सकते.
जब जागो तभि सवेरा, यह एक कहावत है
पर रात के अन्धेरे को दिन का उजाला कह नही सकते
बाप बेटे की पटती नही
सास बहू की जमती नही
मां बेटी एक तरफ हो जाएं
तो बाप बेटे की भी चलति नही.
रिश्तों में जब इतनी कडवाहट है
तो विचारों मे समझदारी कहां से हो?
काश ऐसा हो सकता?
यह एक भ्रम है
जिन्दगी जीने का नाम है
यह एक क्रम है.
शांति की खोज
घर से निकली थी
शांति की खोज में
शांति?
अरे वही जिसे हरकोई
मन:शांति के नाम से जानते हैं.
जिसजिस को पूछा,
शांति मिली क्या?
पूरब से पश्चिम तक
गरदन हिला कर
जवाब मिला नही.
हर किसी ने सलाह दी
आगे बढती जाओ
जिन्दगी के उस आखरी छोर पर
शायद खडी हो!
वहां तक जाने के लिये
मै अभी तैयार न थी.
इस लिये लौट आई.
आकर झरोखे में बैठ गई
आपने कभी झरोखे मे बैठ कर
नीचे झांक कर
देखा है?
जरूर देखिये
शायद वहीं आपके प्रश्ण का
जीवन के सारांश का
न चाहते हुए भी
उत्तर मिल जाये.
वही हुआ
नीचे झांक कर देखा
अरे! ये आक्रुति तो पहचानी सी है
झरोखेसे उठ कर
दालान मे आई
कुंडी खडखडाई
अन्दर से आवाज आई
खुला है
जाकर देखा
आंख पर चश्मा
हात मे किताब
शांतचित्त किताब मे मग्न
मुखप्रुष्ट पर झांका
हंसते हुए खडी थी
मन: शांति.
Wednesday, November 12, 2008
तुम राम मै रावण.तुमसामाजिक मै असामाजिक.
तुम राम, मै रावण
तुम्हारेलिये आवश्यक लौकिकसम्मान
मेरेलिये आवश्यक आत्मसम्मान.
तुम्हारेलिये आवश्यक अहिल्या का उद्धार
मेरेलिये आवशक शुर्पणखा की नाक का बदला.
तुम राजा के पुत्र जो ब्राम्हण बने,
मै ब्राम्हण पुत्र जो राजा बना.
तुमने शिव का धनुश उठाया,
मैने शिव का कैलाश उठा लिया.
तुमने छल से छुप कर बालि को मारा,
मै खुलेआम बल से लड कर बालि से हारा.
तुम हर साल अपनी छल से जीति हुई,
विजय का डंका बजाते हो,
मै हरसाल सारी दुनिया के पाप उठाये,
जल लाता हूं
फिर तुम कैसे राम, और मै क्यूं रावण
जवाब
न मै राम न तुम रावण
आत्मसम्मान से पहले जरुरि है
आत्म नीरिक्षण
लौकिक सम्मान तो मिल ही जायेगा.
अहिल्या उद्धार या शुर्पणखा की नाक के
बदले ही मे सिर्फ
सामाजिकता नहि मिलेगी.
राम को असामाजिकता का नाश करना होगा
उसकेलिये रावण होने की जरुरत नही
आज छल से छुप कर बाली को मारने की भी आवश्यकता नही
हर दिन तो खुलेआम राम मर रहा है
चाहे धनुश उठाओ या कैलाश
आज राम और रावण दोनो ही दयनीय हैं.
तुम राम, मै रावण
तुम्हारेलिये आवश्यक लौकिकसम्मान
मेरेलिये आवश्यक आत्मसम्मान.
तुम्हारेलिये आवश्यक अहिल्या का उद्धार
मेरेलिये आवशक शुर्पणखा की नाक का बदला.
तुम राजा के पुत्र जो ब्राम्हण बने,
मै ब्राम्हण पुत्र जो राजा बना.
तुमने शिव का धनुश उठाया,
मैने शिव का कैलाश उठा लिया.
तुमने छल से छुप कर बालि को मारा,
मै खुलेआम बल से लड कर बालि से हारा.
तुम हर साल अपनी छल से जीति हुई,
विजय का डंका बजाते हो,
मै हरसाल सारी दुनिया के पाप उठाये,
जल लाता हूं
फिर तुम कैसे राम, और मै क्यूं रावण
जवाब
न मै राम न तुम रावण
आत्मसम्मान से पहले जरुरि है
आत्म नीरिक्षण
लौकिक सम्मान तो मिल ही जायेगा.
अहिल्या उद्धार या शुर्पणखा की नाक के
बदले ही मे सिर्फ
सामाजिकता नहि मिलेगी.
राम को असामाजिकता का नाश करना होगा
उसकेलिये रावण होने की जरुरत नही
आज छल से छुप कर बाली को मारने की भी आवश्यकता नही
हर दिन तो खुलेआम राम मर रहा है
चाहे धनुश उठाओ या कैलाश
आज राम और रावण दोनो ही दयनीय हैं.
एक थी साई
विश्वास की जाई
बोली
मेरे भगवन तुम महान हो
सभ्य हो
सत्य हो
सैर भी हो
भ्रम तो नहीं हो?
विश्वास ने दिया धोखा
भ्रम ने हाथ थामा
चली साई उसके आसरे
बोली भगवन तुम महान हो
वैध हो
अवैध हो
असम्भव हो
भ्रम ने छोडा साथ
साई गिरी, फिर उठी
वैध के सहारे
झेले अंगारे
खाये क्षण
अवैध के साथ हो ली
बोली मेरे भगवन तुम महान हो
विश्वास, भ्रम, वैध अवैध
सब को लेकर
मैं तेरे पीछे
मैं साई विश्वास की जाई
तुझमें समाने चली आई
ये कोई भ्रम तो नहीं?
विश्वास की जाई
बोली
मेरे भगवन तुम महान हो
सभ्य हो
सत्य हो
सैर भी हो
भ्रम तो नहीं हो?
विश्वास ने दिया धोखा
भ्रम ने हाथ थामा
चली साई उसके आसरे
बोली भगवन तुम महान हो
वैध हो
अवैध हो
असम्भव हो
भ्रम ने छोडा साथ
साई गिरी, फिर उठी
वैध के सहारे
झेले अंगारे
खाये क्षण
अवैध के साथ हो ली
बोली मेरे भगवन तुम महान हो
विश्वास, भ्रम, वैध अवैध
सब को लेकर
मैं तेरे पीछे
मैं साई विश्वास की जाई
तुझमें समाने चली आई
ये कोई भ्रम तो नहीं?
Sunday, October 12, 2008
ek bund pani ki
ek bund paani ki ptte par atki thi
neeche bahataa paani upar ghanee badali thi
kyaa karun kyaa na karun ? soch me padee thi
geer ti hun to baha jaa ungee , ruktee hun to dhul jaaungee
aisaa hi kuch ye jeevan hai , marne se darataa hai
jeene ko tarastaa hai ,
is udhed bun me
na jeetaa hai na marataa hai .
neeche bahataa paani upar ghanee badali thi
kyaa karun kyaa na karun ? soch me padee thi
geer ti hun to baha jaa ungee , ruktee hun to dhul jaaungee
aisaa hi kuch ye jeevan hai , marne se darataa hai
jeene ko tarastaa hai ,
is udhed bun me
na jeetaa hai na marataa hai .
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